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Farmer's Success Story: एक बार लगाओ-तीन बार काटो, इस फसल से लाखों का होगा मुनाफा

अशोक गुप्ता पहले गन्ना ,गेहूं ,धान की खेती करते थे. छुट्टा जानवरों और रासायनिक कीटनाशकों एवं उर्वरकों पर निर्भर रहने से उनकी फसल की लागत दिन प्रतिदिन बढ़ रही थी. इस बीच उन्होंने औषधीय फसलों की खेती की शुरुआत की. इससे वह सालाना लाखों का मुनाफा कमा रहे हैं.

Farmers Success Story: एक बार लगाओ-तीन बार काटो, इस फसल से लाखों का होगा मुनाफा
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Farmer's Success Story: उत्तर प्रदेश के सीतापुर के रहने वाले अशोक गुप्ता परंपरागत फसलों की खेती करते थे. हर साल लगातार लागत इजाफा होने और छुट्टा जानवरों के आतंक से उन्हें खासा नुकसान झेलना पड़ता था. ऐसे में किसी ने उन्हें औषधीय फसलों की खेती करने की सलाह दी. अब अशोक औषधीय फसलों की खेती से सालाना लाखों का मुनाफा कमा रहे हैं.

घाटे का सौदा साबित हो रही थी खेती

अशोक गुप्ता ने 'आजतक' से बात करते हुए बताया कि पहले वह गन्ना ,गेहूं ,धान की खेती करते थे. लेकिन छुट्टा जानवरों के चलते व रासायनिक कीटनाशकों एवं उर्वरकों पर निर्भर रहने से उनकी फसल की लागत दिन प्रतिदिन बढ़ रही थी. खेती उनके लिए घाटे का सौदा साबित हो रही थी. कई बार खेत के चारो तरफ़ तारों की फेंसिंग भी कराई लेकिन उसके बावजूद जानवर उनकी फसल को चट कर जाते थे.

सीतापुर बिसवां ब्लॉक के गांव कमुवा अशोक गुप्ता आगे बताते हैं कि साल 2017 में कृषि विज्ञान केंद्र कटिया से सम्पर्क में आने के बाद उन्होंने सीमैप लखनऊ से प्रशिक्षण दिलाया गया. फिर एक एकड़ जमीन पर ब्राम्ही (Bacopa monnieri)बकोपा की खेती शुरू करी. आज वह एक एकड़ में सालाना 2 से 3 लाख रुपये आसानी से कमा रहे है‌. इसके अलावा जिले में अन्य लोगो को औषधीय खेती के बारे में जागरुक कर रहे हैं.

एक बार लगाओ साल में तीन बार काटो

अशोक गुप्ता बताते है कि ब्राम्ही (Bacopa monnieri) बकोपा की खेती बहुत ही लाभदायक है. औषधीय गुणों की वजह से छुट्टा जानवर इसे खाते नहीं हैं. वहीं, दूसरी ओर एक एकड़ में सिर्फ 20 से 25 हजार रुपये की लागत आती है. इस फसल को एक बार लगाने के बाद साल में तीन बार कटाई कर सकतें हैं. इसके अलावा इसके साथ सहफ़सली के तौर पर मक्का, अरहर की बुवाई कर सकते हैं.

खेती में लागत कम करने के लिए अपनाई प्राकृतिक खेती की देशी विधि

अशोक गुप्ता कहते हैं कि रासायनिक खेती से जमीन बंजर होती चली जा रही है. दिन प्रतिदिन उत्पादन घट रहा था और लागत बढ़ती चली जा रही थी. बढ़ती लागत को कम करने एवं भूमि की उर्वरा शक्ति को बनाए रखने के लिए वे खुद अपने घर पर देशी ग़ाय के गोबर एवं गौमूत्र से जीवामृत, घनजीवामृत और आपने आसपास की वनस्पतियों से कीट रोधक दवाइयां तैयार करके खेती में प्रयोग करते हैं. इससे उनकी 75 फीसद लागत कम हो जाती है.

औषधीय खेती में दिखा लाभ तो ठेके पर जमीन लेकर बढ़ाया दायरा

प्राकृतिक रूप से उत्पादित औषधीय फसल उत्पादन से उत्साहित होकर वर्तमान में अशोक गुप्ता ने 4 एकड़ जमीन किराए पर लेकर ड्रैगन फ्रूट, अकरकरा, कैमोमिल, तुलसी, अश्वगंधा, हिबिस्कस की खेती करने लगे हैं जिनसे उन्हें वार्षिक रुप में 7-8 लाख रुपए की आय प्राप्त हो रही है. बाजार की बात करें तो इनकी फसल प्राकृतिक रूप से उत्पादित होने के कारण खरीददार इनके खेत से ही फसल लेने के लिए तैयार रहते हैं. अशोक के मुताबिक है कि पहले जब हम रासायनिक उर्वरकों कीटनाशकों से फसल उत्पादित करते थे तो हमें स्वयं बाजार ढूंढना पड़ता है लेकिन प्राकृतिक तरीके से खेती करने की वजह से लोग उनकी फसल खरीदने वाले खेतों तक पहुंच जाते हैं.

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